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छिंदवाड़ा 'मेला : पारंपरिक पत्थरबाज़ी के लिए मशहूर

 Girish Tiwari |  2016-09-02 14:57:30.0

mpछिंदवाड़ा : मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में वर्षो पहले प्यार की खातिर जान देने वाले युवक-युवती की याद में पांढुर्ना गांव में शुक्रवार को आयोजित गोटमार मेला में परंपरा के मुताबिक दो गांवों के बीच पत्थर युद्ध हुआ, जिसमें 400 से ज्यादा लोग घायल हो गए। गंभीर रूप से घायल दो लोगों को नागपुर रेफर किया गया है। छिंदवाड़ा के पांढुर्ना में परंपरा के मुताबिक, चंडीमाता के मंदिर के पास जाम नदी पर सावरगांव और पांढुर्ना के लोगों के बीच पोला पर्व (बैलों की पूजा का पर्व) के दूसरे दिन लगने वाले गोटमार मेला में पत्थरबाजी होती आई है। शुक्रवार को भी यह मेला लगा और यहां पहुंचने वालों ने एक-दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए।


पुलिस अधीक्षक जी.के. पाठक ने आईएएनएस को बताया कि वर्षो से चली आ रही परंपरा के मुताबिक, शुक्रवार को भी गोटमार मेला लगा। इस मेले के दौरान हुए पत्थर युद्ध में 400 लोग घायल हुए हैं। इनमें से 61 घायल अस्पताल ले जाए गए। दो की हालत गंभीर होने पर उन्हें नागपुर भेजा गया है। बाकी को मेला स्थल पर ही प्राथमिक उपचार मुहैया कराया गया।

उन्होंने आगे बताया कि इस बार प्रशासन ने गोटमार मेला में गोफन (रस्सी में बांधकर पत्थर फेंकना) के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाई थी, क्योंकि रस्सी में बांधकर पत्थर के फेंकने से उसकी रफ्तार कई गुना तेज होकर सामने वाले को ज्यादा आघात पहुंचाती है।

पाठक ने आगे बताया कि सुरक्षा के लिए पांच सौ से ज्यादा जवानों की तैनाती की गई। साथ ही घायलों को बेहतर उपचार मिल सके, इसके लिए चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मी तैनात रहे और एंबुलेंस भी मौके पर रही।

मान्यता का हवाला देते हुए स्थानीय लोग बताते है कि गोटमार मेला एक प्रेमी युगल की प्यार की खातिर जान देने की याद में आयोजित किया जाता है। किंवदंती है कि पांढुर्ना के लड़के को सावरगांव की लड़की से मुहब्बत थी और वह लड़की को लेकर भागा था, जिस पर दोनों गांव के लोगों मे जमकर पत्थरबाजी हुई थी और इसमें प्रेमी युगल मर गए थे। उसी की याद में यहां हर साल गोटमार मेला लगता है।

कई वर्षो से चली आ रही परंपरा के मुताबिक, जाम नदी के बीच में पलाश के पेड़ पर एक झंडा लगाया जाता है। नदी के दोनों किनारों पर गांव के लोग खड़े होकर उस झंडे को गिराने के लिए पत्थर चलाते हैं। जिस गांव के लोग झंडे को गिरा देते हैं, उसे विजेता माना जाता है।

पुलिस अधीक्षक के अनुसार, इस मेले में हिस्सा लेने के लिए सुबह से ही बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था और दोपहर आते तक पत्थरबाजी भी शुरू हो गई। यह पत्थर युद्ध देर शाम तक चलता रहा।

गोटमार मेले को लेकर पांढुर्ना व सावरगांव के लोगों में खासा उत्साह होता है, यही कारण है कि दोनों गांव के लोग कई दिनों पहले से पत्थरों को जमा करने लगते हैं।

राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा इस खूनी खेल पर एतराज जताए जाने के बाद गोटमार मेला में एक बार पत्थर के स्थान पर रबर की गेंद का इस्तेमाल किया गया था, मगर यह प्रयोग कारगर नहीं रहा था।

प्रशासन इस पर्व में हर साल अन्य कई खेल व कार्यक्रम भी कराता है, ताकि लोग पत्थरबाजी कम करें या छोड़ दें, लेकिन परंपरा निभाने के नाम पर पत्थर युद्ध बंद नहीं हो पा रहा है।

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