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मौत बरकत का नाम है : गजनफर अब्बास तूसी

 Sabahat Vijeta |  2016-06-02 13:10:51.0

gaznafar abbas toosiतहलका न्यूज़ ब्यूरो


लखनऊ. मौलाना गजनफर अब्बास तूसी ने आज हजरत कासिम हाल में इब्ने हसन एडवोकेट के चालीसवें की मजलिस में मौत को बरकत करार देते हुए कहा कि यह मनहूसियत का नाम नहीं बल्कि बरकत का नाम है.


मौलाना ने कहा कि बरकत का मतलब प्रॉफिट से लिया जाता है. जिस काम में कम लगाकर ज्यादा कमाया जाए उसे बरकत माना जाता है लेकिन मौत ज़िन्दगी के खत्म हो जाने का नाम है. अल्लाह ने मौत को बरकत इसलिए बताया है क्योंकि इंसानी ज़िन्दगी बहुत सीमित है. कुछ ही साल में ज़िन्दगी खत्म हो जाती है लेकिन क़यामत अनलिमिटेड है. उसके आने का वक़्त किसी को पता नहीं है. अल्लाह के रसूल का वादा है कि अहलेबैत की मोहब्बत करते हुए ज़िन्दगी बिताने वाला मौत के बाद अपनी ज़िन्दगी शुरू करता है और यह ज़िन्दगी क़यामत तक चलने वाली है.


मौलाना गजनफर अब्बास ने कहा कि दुनिया में सिर्फ मौत ही वह शय है जिस पर सबको यकीन है. कोई अल्लाह को मानता हो या न मानता हो लेकिन मौत पर ज़रूर यकीन रखता है. सबको पता है कि मौत आना तय है. किताब आसमानी हो या ज़मीनी हो. इस्लाम से ताल्लुक़ रखने वाली किताब हो या हिन्दू धर्म से ताल्लुक़ रखने वाली किताब हो. मौत का तजकिरा हर जगह है.


मौलाना ने कहा कि मौत को बरकत बनाने के लिए इंसान की ज़िन्दगी का सलीका भी बरकत वाला होना चाहिए. हर किसी को ज़िन्दगी का मकसद और ज़िन्दगी जीने का तरीका मालूम होना चाहिए. सही राह पर चलने वाले को क़यामत तक याद रखा जाएगा और गलत रास्ते पर चलने वाले और दहशतगर्दी व खूंरेजी फैलाने वाले को क़यामत तक लानत भेजी जायेगी.


उन्होंने कहा कि इस्लाम में शैतान और यजीद को लानत भेजने की परम्परा है तो हिन्दू धर्म में रावण पर लानत भेजने की परम्परा है.


आखीर में मौलाना ने कर्बला में हक और इन्साफ के लिए हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत का मंज़र पेश किया जिसे सुनकर लोग फूट-फूटकर रो पड़े.


मजलिस से पहले हज़रत कासिम हाल में मशहूर शायर

नय्यर मजीदी ने सुनाया :-


ज़बां पे हक़ तो हथेली पे जान रखते हैं.
हुज़ूर शाद रहें बस यह ध्यान रखते हैं.
अली को देखा तो क़ुरान फक्र से बोला.
ख़ामोश हैं तो मगर तर्जुमान रखते हैं.
उन्हीं ने हमसे किया है निजात का वादा.
जो अपने मुंह में खुदा की ज़बान रखते हैं.


मंज़र उतरौलवी के यह शेर बहुत पसंद किये गए :-


कर्बला से जबसे पलटा हूँ यही अहसास है.
काश रहता एक-दो दिन और मेहमाने हुसैन.
कुछ इस तरह ज़िक्रे सय्यदे वाला
खुदा ने जैसे यही सांस आख़री दी है.


मजलिस में जस्टिस हैदर अब्बास रजा, लखनऊ के पूर्व मेयर डॉ. दाऊजी गुप्त, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर, वरिष्ठ कांग्रेस नेता अमीर हैदर, नवाब जाफर मीर अब्दुलाह सहित बड़ी तादाद में लोग मौजूद थे.

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