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भाजपा के पास यूपी में नहीं है कल्याण सिंह का विकल्प

 Tahlka News |  2016-06-14 11:17:36.0

kalyaan rajnaath varun

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. इलाहाबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी यूपी के समर में भाजपा का चेहरा नहीं तलाश पायी और यह सवाल एक बार फिर अनुत्तरित रह गया. इस बैठक से पहले कई नाम सियासी गलियारों में तैर रहे थे मगर पार्टी अब तक अपनी राय नहीं बना सकी है.

स्मृति ईरानी से ले कर वरुंण गाँधी और योगी आदित्यनाथ के साथ केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का नाम भी यदा कदा चर्चा में आता रहा है. मगर पार्टी के कार्यकर्त्ता इनमें से किसी एक नाम पर भरोसा नहीं जताते दिखाई दे रहे हैं.


पार्टी और आरएसएस दोनों के ही आतंरिक सर्वे यह बताते हैं कि कार्यकर्ताओं से ले कर मतदाताओं तक का मानना है कि सिर्फ कल्याण सिंह ही एक ऐसा नाम है जो मिशन यूपी में भाजपा की नैया पार लगा सकता है. मगर यूपी के रहने वाले और केंद्र की राजनीती में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले एक दिग्गज भाजपा नेता इसे नहीं पचा पा रहे और अपने समर्थको के जरिये इस बात को कल्याण सिंह की बढती उम्र का हवाला देते हुए ख़ारिज करने में जुटे हुए हैं.

यूपी के चुनावो को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है. मोदी को बखूबी पता है कि यदि वे यूपी हारे तो 2019 के लिए उनकी संभावनाएं भी संहेद के घेरे में आ जायेगी. इसीलिए  पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यूपी के चुनावो को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं मगर पार्टी के अन्दर की गुटबाजी और सामाजिक समीकरणों को संतुलित न कर पाने के कारण पार्टी अभी अपने पक्ष में हवा बनाने में नाकामयाब ही है. ऐसे में पार्टी के पास सिर्फ कल्याण सिंह का ही चेहरा बचता है जो गुटबाजी से इतर आम जनता में एक सकारात्मक प्रभाव डालने में कामयाब होगा.

बताते चलें कि कल्याण सिंह अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक हैं. यूपी के दो बार मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह भले ही संविधानिक पद पर होने के चलते सक्रिय राजनीति से दूर हों, पर पिछड़े वर्ग का होने के साथ ही वे प्रखर हिंदुत्ववादी चेहरा माने जाते हैं. वे भाजपा के उन चंद नेताओं में हैं, जिनकी सूबे में व्यक्तिगत जान-पहचान है और इसकी अच्छी-खासी तादाद है. नौकरशाही में उनकी प्रशासनिक क्षमता की चर्चा आज भी जब-तब सुनाई देती है.DSC_0284


उनकी सरकार में होने वाली भर्तियों की पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन को भी लोग अभी तक नहीं भूले हैं. प्रदेश में 2017 के चुनावी समर में ये सब मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे, इस बात के संकेत साफ तौर पर अभी से दिखाई देने लगे हैं.

खुद कल्याण सिंह भी यूपी को ले कर बहुत भावुक रहते हैं. फिलहाल राजस्थान के गवर्नर के पद पर रहते हुए भी वे जयपुर के राजभवन में अब भी हर रोज यूपी के 20-25 लोगो से मिलते हैं और उनसे सूबे के हालत पर फीडबैक लेते रहे हैं और इस तरह उत्तर प्रदेश की सियासी नब्ज के हर उतार चढाव पर कल्याण सिंह की पकड़ बनी हुयी है.

हालाकि कल्याण सिंह ने यह स्पष्ट कहा कि अब मुख्मंत्री पद की उनकी कोई तमन्ना नहीं है मगर वे खुद को पार्टी का सिपाही बताते हुए पार्टी द्वारा दी गयी जिम्मेदारियों को स्वीकार करने की बात भी कहते हैं .

कुछ दिनों पहले लखनऊ में अपना जन्मदिन मनाने आये कल्याण सिंह ने व्यक्तिगत बातचीत में कहा था कि जो भी पार्टी का अनुशाषित और समर्पित कार्यकर्ता होगा वह यह जरूँर कहेगा कि “पार्टी च्वाइस इज माय च्वाइस”.

भाजपा के इस दिग्गज नेता का मानना है कि “ यूपी का चुनाव भाजपा के लिए जीतना बहुत आवश्यक है और यह पार्टी के भविष्य के लिए निर्णायक होगा”
कल्याण सिंह ने यूपी के जातीय समीकरणों से भी बखूबी वाकिफ हैं. उन्होंने तब भी कहा था की यूपी में जितना भी सामाजिक समीकरण है उस पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है . और इन समीकरणों का ध्यान संगठन में भी रखना होगा और चुनावो में भी. हमने सामजिक समीकरणों का संतुलन बनाया था और उसका परिणाम सामने आया. मैं समझता हूँ कि जितनी चिंता मैं व्यक्त कर रहा हूँ पार्टी नेतृत्व भी उतनी ही चिंता कर रहा होगा.

2014 के चुनावो में अभूतपूर्व सफलता पाने के बाद भी यूपी में भाजपा अपनी सही छवि की तलाश में जूझ रही है. बेलगाम फायर ब्रांड नेताओं ने आम जनता में अपने बयानों से चिढ पैदा कर दी है. लव जिहाद, घर वापसी और अब कैराना जैसे मामले खोखले साबित हुए और विकास के दावों को पार्टी अपना आधार नहीं बना सकी.

वास्तविकता यह है कि 2014 के बाद पार्टी के समर्थन में काफी कमी आई है. कन्फ्यूजन का आलम यह है कि लगभग दो महीने बाद भी पार्टी के अध्यक्ष केशव मौर्या अपनी कार्यकारिणी तक नहीं घोषित कर सके हैं. अभी अनुशाषित मानी जाने वाली पार्टी के दिग्गज नेताओं , आदित्यनाथ और वरुण गाँधी के समर्थक पोस्टरबाजी से पार्टी नेतृत्व पर दवाब बना रहे हैं.

बीते 6 महीनो में जितने नाम यूपी के चेहरे के बतौर आये हैं उन सबकी अपनी सीमाए हैं. डा. महेश शर्मा की क्षमता साबित होना अभी बाकी है तो योगी आदित्यनाथ की सर्व स्वीकार्य छवि उनकी राजनीनिक शैली के कारण कभी बन ही नहीं सकी. वे उग्र हिंदुत्व के अलमबरदार हैं मगर उसके अलावा योगी के पास कोई पहचान नही है.  वहीँ वरुण गाँधी के पास सिर्फ “गाँधी” के टैग के सिवा कुछ खास नहीं है. साथ ही एक बार बनी हिंदुत्व वाली इमेज के अलावा वे अपनी पहचान में कोई इजाफा नहीं कर सके हैं. राजनाथ सिंह को बखूबी पता है कि उनकी स्वीकार्यता यूपी भाजपा के एक बड़े गुट में नहीं है.

ऐसे में कल्याण सिंह ही एकमात्र ऐसे नेता है जो हर तरह से पार्टी के लिए मुफीद हैं. उनके बेदाग़ कार्यकाल की छाप ,क़ानून व्यवस्था के मामले में उनकी कठोर छवि और अयोध्या का नायकत्व उन्हें भाजपा के लिए सटीक चेहरा बनता है. 80 प्लस की उम्र में भी उनकी युवाओं सरीखी सक्रियता और तेजी कहीं  से उनके द्वावे को कम नहीं होने देती.

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