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सरसों के जीएम सीड को अनुमति के खिलाफ भारतीय किसान यूनियन सड़क पर उतरी

 Sabahat Vijeta |  2016-10-02 12:54:15.0

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लखनऊ. भारतीय किसान यूनियन ने आज देश के विभिन्न स्थानो पर सरकार द्वारा सरसों के जी.एम. सीड के लिए दी गयी अनुमति के विरोध में प्रदर्शन किये. लखनऊ में विधान सभा से हजरतगंज स्थित गाँधी प्रतिमा तक पैदल मार्च कर गाँधी प्रतिमा पर प्रदर्शन किया. भारतीय किसान यूनियन ने प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को संबोधित ज्ञापन में भारत सरकार को पत्र लिखकर सरसों के जी.एम. सीड को अनुमति न देने का अनुरोध किया गया है.


इस कार्यक्रम में धर्मेंद्र मालिक, लखनऊ मंडल अध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा, वरिष्ठ मंडल उपाध्यक्ष आजाद अंसारी, जिला अध्यक्ष लखनऊ गुरमीत सिंह, जिला उपाध्यक्ष संत लाल पटेल, जिला संगठन मंत्री राजेश रावत, ब्लाक अध्यक्ष सरोजनी नगर आशीष यादव, तहसील सदर दिनेश पाल, ब्लाक अध्यक्ष गोसाईगंज किशोरी लाल पटेल ,तहसील अध्यक्ष माल हरिवंश त्रिपाठी, तहसील उपाध्यक्ष मोहनलालगंज रामानंद, सहित सैकड़ों किसान कार्यकर्ता मौजूद थे.


मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) संशोधित जीन वाली जीएम सरसों को अनुमति देने की ओर तेजी से अग्रसर है. वर्ष 2010 में इस कमेटी द्वारा बीटी बैंगन को अनुमति दिये जाने के बाद इसी मंत्रालय द्वारा बीटी बैंगन पर अनिश्चित काल के लिए प्रतिबंध लगाया था, जो अब तक जारी है यानी कि 6 साल गुजर जाने के बाद भी इस की सुरक्षा स्थापित नहीं हुई है.


ज्ञापन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी सरकार को किसान एवं जन हितैषी सरकार बताते हुए कहा गया है कि इस सरकार ने जीएम फसलों के खतरे को पहले ही भांप लिया है और राज्य में जीएम फसलों के क्षेत्र परीक्षण तक की अनुमति नहीं दी. अधिकांश राज्य सरकारों, जिन में सरसों बोने वाले मुख्य राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं हरियाणा भी शामिल हैं, ने भी जीएम फसलों के खेत परीक्षण तक की अनुमति नहीं दी है. समाजवादी पार्टी पूर्व से ही इन फसलों के विरोध में रही है, आपके द्वारा भी पूर्व में इन फसलों को अनुमति न दिये जाने का आश्वासन किसान संगठनों को दिया जाता रहा है.


खेती को राज्य के अधिकार का विषय बताते हुए कहा गया है कि वर्तमान केंद्रीय सरकार राज्य सरकारों की राय की अनदेखी कर के देश की कृषि को विदेशी कम्पनियों के हवाले करने की कमर कसे है. यह इस के बावजूद है कि संविधान के अनुसार कृषि राज्य सरकार के अधीन विषय है. इस लिए जीएम कृषि उत्पादों को मंजूरी देते हुये राज्य सरकारों की राय को भी ध्यान में रखना चाहिए. बीटी बैंगन पर प्रतिबंध के पीछे यह भी एक अहम कारण था. यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जिस से ऐसे राज्य में, जो नीतिगत तौर पर जीएम फसलों के खिलाफ हैं, वहाँ ऐसे बीजों को जाने से रोका जा सके। इस स्थिति में अगर केंद्र जीएम सरसों को मंजूरी देने पर जोर देगा तो संघीय भावना और राज्य की स्वायत्ता को कैसे कायम रखा जा सकता है?


इस लिए भारतीय किसान यूनियन, जो देश के किसानों का एक अग्रणी संगठन ने यह तय किया है कि किसान एवं जन विरोधी जीएम सरसों का पुरजोर विरोध किया जाए। आप से भी हम पूरे समर्थन बल्कि इस संघर्ष में नेतृत्व की आशा करते हैं. देश भर के किसान संगठनों एवं वैज्ञानिकों द्वारा जीएम सरसों के इस विरोध के ठोस वैज्ञानिक कारण है.


एक मात्र जीएम फसल जिस की अनुमति अब तक देश में दी गई है, बीटी कपास का हश्र देश के सामने हैं. जहाँ एक ओर बीटी कपास के आने के बाद सदियों से चली आ रही देसी किस्मों की शुद्धता चंद वर्षों में लगभग खत्म हो गई, बाजार में कपास का शुद्ध गैर-बीटी बीज मिलना दूभर हो गया, वहीं चंद वर्षों में ही पहले बीटी कपास एक, फिर बीटी कपास दो और अब बीटी कपास तीन लाने की नौबत आ गई है. जिस तकनीक से उत्पन्न बीज चंद सालों में खत्म हो जाते हैं, बीज शायद उतने साल भी नहीं चलते जितने साल उन्हें विकसित करने में लगते हैं, कोई सरकार किस प्रकार उस तकनीक पर विश्वास कर के सरसों जैसे रोजमर्रा के खाद्य उत्पाद, में जीएम बीज लाने की सोच सकती है?


ज्ञापन में कहा गया है कि ऐसे अनेक कारण हैं जिन की वजह से जीएम सरसों को अनुमति देना किसानों, उपभोक्ताओं देश की खाद्य संप्रभुता और राज्यों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ होगा. जीएम सरसों के पक्ष में दिये जा रहे तर्क सचेत रूप से भ्रामक, अवैज्ञानिक, अपर्याप्त और अविश्वसनीय हैं.

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