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किन्नरों के लिए अपना 'आश्रम' किसी जंग से कम नहीं

 Sabahat Vijeta |  2016-07-03 16:25:44.0

Kinnarअंकित सिन्हा  


नई दिल्ली. देश में किन्नरों के लिए आश्रय तलाशना किसी जंग से कम नहीं है। वे बहिष्कृत कर दिए जाते हैं, अपमानित होते हैं और तिरस्कृत भी कर दिए जाते हैं। पर, कहते हैं कि हौसलों के आगे जीत है और शायद इसीलिए तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अधिकारों को लेकर उनकी जंग जारी है।


देश के पहले किन्नर समूह '6 पैक बैंड' की सदस्य फिदा के अनुसार, उनका समुदाय मुंबई क्षेत्र में एक आश्रम की कोशिशों में जुटा है, पर अभी तक इसके लिए उन्हें जमीन भी नहीं मिली है। किन्नरों के संगठन 'किन्नर मा सामाजिक संस्था ट्रस्ट' ने मुंबई में किन्नरों के लिए अलग आश्रम का अनुरोध किया, लेकिन इस पर काम होना अभी बाकी है।


उन्होंने बताया, "बहुत से नि:शक्त किन्नर हैं, जो या तो बेघर हैं या जिन पर तेजाब से हमले हुए हैं। कुछ ऐसे हैं, जिन्हें रेलगाड़ी में भीख मांगने के दौरान नीचे फेंक दिया गया और इस क्रम में वे गंभीर रूप से जख्मी हो गए। वरिष्ठ नागरिकों के लिए आश्रम हैं, लेकिन किन्नरों के लिए कुछ भी नहीं है।"


भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत होमोसेक्सुअलिटी को अपराध करार दिया गया है। वहीं देश के लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग इस आधार पर कानून को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं कि यह उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है।


दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2009 में धारा 377 को निरस्त कर दिया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में इस फैसले को पलट दिया। सर्वोच्च न्यायालय में इस साल की शुरुआत में इस पर फिर सुनवाई हुई, जिसमें शीर्ष अदालत ने अपने फैसले को बरकरार रखा।


इसके बाद सेलिब्रिटी शेफ ऋतु डालमिया सहित अन्य हस्तियों के एक समूह ने इस दंडात्मक प्रावधान को समाप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को नई याचिका पर यह कहते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया कि इसे सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर के समक्ष रखा जाएगा।


सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में किन्नरों को 'तृतीय लिंग' के रूप में पहचाने जाने का आदेश दिया और कहा कि उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत आरक्षण दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल नवंबर में किन्नरों के साथ संवेदनशीलता के साथ पेश आने का आह्वान करते हुए कहा था, "हमें किन्नरों के लिए नए कानून बनाने और पुराने कानूनों में संशोधन करने की जरूरत है।"


अधिकारों के लिए संघर्षरत फिदा ने कहा कि ट्रस्ट पिछले करीब पांच-छह सालों से आश्रम के लिए अनुमति लेने के प्रयास में जुटा है, पर राजनीतिक कारणों से अब तक इसमें सफलता नहीं मिल पाई है। फिदा ने फोन पर मुंबई से आईएएनएस को बताया, "हम पिछले पांच-छह वर्षो से आश्रम के लिए संघर्षरत हैं। हमने ठाणे में भी आश्रम के लिए कहा है।"


फिदा को '6 पैक बैंड' से ख्याति मिली है, जिसने कान्स लायन्स फेस्टिवल में कान्स ग्रैंड प्रिक्स ग्लास लॉयन जीता। यह सामाजिक कार्यो को समर्थन देने वाले समूहों को दिया जाता है। यशराज फिल्म्स की युवा इकाई वाई-फिल्म्स द्वारा समर्थित इस समूह ने फिल्म जगत में सोनू निगम और ऋतिक रोशन सहित कई दिग्गज हस्तियों के साथ काम किया है और उन्हें इनका समर्थन प्राप्त है।


फिदा का कहना है कि वह इस मंच का इस्तेमाल अपने समुदाय की मदद के लिए करना चाहती हैं। उन्होंने कहा, "आज लोग हमारे छह सदस्यीय बैंड को जानते हैं, पर हमारे समुदाय के हजारों लोगों को कौन जानता है? हमारी आवाज कौन होंगे? मैं इस बैंड के जरिये लोगों तक अपने समुदाय की इच्छाओं/आकांक्षाओं को पहुंचाना चाहती हूं।"


फिदा का कहना है कि आश्रम के अभाव में पहले से ही हाशिये पर जी रहे देश के किन्नर समुदाय के सदस्यों को सड़कों पर भीख मांगने या बार में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, "कुछ सड़कों पर उपेक्षित जीवन बिता रहे हैं तो कुछ बार में फंसे हुए हैं। हमारी उपेक्षा की जाती है। हम सड़कों पर ही मर जाएंगे। सरकार हमारी ओर ध्यान नहीं दे रही है।"


किन्नर मा सामाजिक संस्था ट्रस्ट ने देश में किन्नर समुदाय के लिए भी समान अधिकारों की मांग करते हुए पिछले साल पिंक रैली का आयोजन किया था। फिदा के अनुसार, ऐसी रैलियों और समर्थन के बावजूद देश में किन्नरों को समाज की मुख्यधारा में जगह बनाना बाकी है। उन्होंने कहा, "किसी ने हमारी मदद नहीं की। हमनें पिंक रैली की, लेकिन कुछ ही समय बाद इसका शोर थम गया। किसी ने कुछ नहीं किया।"


फिदा के अनुसार, देश में किन्नर समुदाय को लेकर बहिष्कार की स्थिति इस कदर है कि उनके लिए किराये के घरों में रहना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा, "हम जहां कहीं भी किराये के घर में रहते हैं, लोग कहते हैं, 'आपने हिजड़ा को क्यों रखा है?' फिर हम कहां जाएं? यही वजह है कि हमें एक आश्रम की आवश्यकता है, ताकि हम अपने समुदाय के सदस्यों के साथ सम्मानपूर्वक रह सकें।"

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