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इस कोशिश से मायावती की बेचैनी बढ़ना लाज़िम है

 Sabahat Vijeta |  2016-03-28 15:40:18.0

शबाहत हुसैन विजेता


Mayawatiलखनऊ, 28 मार्च. उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है. सभी राजनीतिक दल वोटों की सेंधमारी में जुट गए हैं. इस सेंधमारी में सबसे ज्यादा नुकसान बहुजन समाज पार्टी को होने वाला है. बहुजन समाज पार्टी भी यह बात अच्छी तरह से जानती है और अपने दलित वोट बैंक को सहेजने में रात-दिन एक किये हुए है.


दलित कभी कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था. यह कांग्रेस से तब छिटका जब कांशीराम और मायावती के रूप में दलितों को अपने नेता मिल गए. कांशीराम और मायावती ने इस वोट बैंक को बड़ी होशियारी से इस्तेमाल किया. दोनों नेताओं ने दलितों को यह अहसास कराया कि सत्ता में क्योंकि उनका प्रतिनिधित्व नहीं है इसलिए उनके साथ इन्साफ नहीं हो पा रहा है.


दलितों के बल पर मायावती ने चार बार उत्तर प्रदेश की कमान संभाली तो सभी राजनीतिक दलों की समझ में यह बात आ गई कि इस वोट बैंक को साधकर सत्ता को आसानी से हासिल किया जा सकता है. मायावती देश की सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री बनने वाली दलित महिला हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह माना जाता है कि दलित वोटरों पर सबसे ज्यादा मायावती का असर है. उत्तर प्रदेश में 19 प्रतिशत वोट दलितों के हैं और इन पर मायावती का एकाधिकार जैसा है.


समाजवादी पार्टी 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों के सहारे सत्ता की सीढ़ी चढ़ती है. यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल 19 प्रतिशत दलित और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों की तरफ वादों का चारा फेंकने में लगे हैं. दलितों के सामने आरक्षण और मुसलमानों के सामने सुरक्षा का मुद्दा इस अंदाज़ में उठाया जाता है कि कब यह वोट बैंक में बदल जाते हैं यह बात खुद उन्हें पता नहीं चलती है.


दलित और मुस्लिम का गठजोड़ बनाकर 37 फीसदी वोटों में सेंधमारी का काम सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं. अपने हिन्दुत्ववादी चेहरे से पहचानी जाने वाली भाजपा भी इसमें पीछे नहीं है. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपनी छवि बदलकर सबका प्रधानमंत्री वाली छवि बना ली है. वह अब न तो मन्दिर-मस्जिद के विवाद पर कुछ बोलते हैं और न ही मुसलमानों पर ही कोई टिप्पणी करते हैं अलबत्ता उनमें इधर डॉ. अम्बेडकर के प्रति गज़ब का प्रेम जगा है. हाल में वह लखनऊ आये तो अम्बेडकर महासभा के कार्यालय भी गए. गाहे-बगाहे वह ऐसे बयान भी देते रहते हैं ताकि दलितों को यह महसूस होता रहे कि केंद्र सरकार दलितों के लिए बहुत कुछ करना चाहती है.


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में अम्बेडकर मेमोरियल इंस्टीटयूट की आधारशिला रखते हुए यह कहा कि दलितों से आरक्षण का अधिकार कोई छीन नहीं सकता है. इधर जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहा है वैसे-वैसे प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा भी गर्माता जा रहा है. मायावती यूँ भी अक्सर प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर उन लोगों को कोसती रहती हैं जो दलितों से आरक्षण को छीनना चाहते हैं.


दलित वोटों में सेंधमारी के लिए अब असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी खडी होती नज़र आ रही है. ओवैसी ने जय भीम के साथ-साथ जय मीम का नारा राजनीति के मैदान में फेंक दिया है. जय मीम से जहाँ उनकी नज़र मुस्लिम वोटरों की तरफ है वहीं साथ में जय भीम बोलकर वह दलित वोटों में भी सेंधमारी करते नज़र आ रहे हैं.


दलित वोटों पर अब तक बसपा का एकछत्र राज रहा है लेकिन यूपी में करीब आती चुनाव की आहट में भाजपा, कांग्रेस, सपा और अब ओवैसी की पार्टी बसपा की बेचैनी को बढ़ाने का काम करने में लगी हैं. जैसे-जैसे चुनावी पारा ऊपर चढ़ेगा वैसे-वैसे जातीय गणित भी अपने गुणा-भाग में जुटेगा, सत्ता का ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा.

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