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साहित्यकार देश की सांस्कृतिक विरासत एवं विशेषता के वाहक हैं

 Sabahat Vijeta |  2016-12-26 16:43:30.0

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने माधव सभागार निराला नगर में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के स्वर्ण जयंती समापन समारोह में प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली के प्रभात कुमार, छोटी खाटू पुस्तकालय के प्रकाश बेताला, गीता प्रेस के ईश्वर प्रसाद पटवारी, तेलंगाना के सांकल्य पत्रिका के सम्पादक डाॅ. गोरखनाथ तिवारी को उनकी उत्कृष्ट साहित्य सेवा के लिये शाल, स्मृति चिन्ह व अपनी पुस्तक चरैवेति! चरैवेति!! की हिन्दी प्रति देकर सम्मानित किया.


इस अवसर पर मुख्य वक्ता श्रीधर पराड़कर, विशिष्ट अतिथि भारतीय पुस्तक न्यास की अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा, साहित्य परिषद के अध्यक्ष प्रो0.त्रिभुवन नाथ शुक्ल, कार्यकारी अध्यक्ष डाॅ. सुशील चन्द्र त्रिवेदी, राष्ट्रीय महामंत्री ऋषि कुमार मिश्र, संयोजन पवनपुत्र बादल सहित बड़ी संख्या में अन्य विशिष्टजन उपस्थित थे. राज्यपाल ने इस अवसर पर साहित्य परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘हमारे साहित्यकार’ का लोकार्पण भी किया.


राज्यपाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि यह सुखद संयोग है कि आज अखिल भारतीय साहित्य परिषद के स्वर्ण जयंती का समारोह 25 दिसम्बर को आयोजित किया जा रहा है. आज के दिन पूरे विश्व में ईसा मसीह का जन्म दिन मनाया जा रहा है जिन्होंने प्रेम और करूणा का संदेश देते हुये गरीबों, पीड़ितों और रोगियों की मदद का मार्ग दिखाया, भारत रत्न पं. मदन मोहन मालवीय का भी जन्म दिन है जिन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना करके हिन्दुस्तान की शिक्षा को नयी दिशा दी तथा पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जैसे असाधारण नेता, लेखक, कवि और प्रखर वक्ता का जन्म दिन है, जिनमें सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने कहा कि आज का दिन हम त्रिवेणी संगम के रूप में देख सकते हैं.


श्री नाईक ने कहा कि अखिल भारतीय साहित्य परिषद भारतीय भाषाओं के साहित्य के उन्नयन में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रहा है. किसी भी संस्था के लिये पचास साल की अबाध यात्रा ऐतिहासिक उपलब्धि है. यह आत्मावलोकन का अवसर होता है कि अब तक संस्था द्वारा क्या किया गया और आगे उसको विस्तार देने के लिये कैसे नये विचारों का समावेश किया जाये. शाश्वत जीवन मूल्यों की रक्षा में साहित्य का योगदान सर्वथा सराहनीय है. मानवीय अभिरूचियों को विकसित करने में भी साहित्य की विशिष्ट महत्ता है. साहित्य का सृजन सचमुच महान कार्य है. साहित्य सृजन से समाज को समाधान मिलता है. साहित्य के संवर्धन में उतना ही महत्व प्रकाशन, मुद्रण, पाठकों एवं पुस्तकालयों का भी है. साहित्य की रचना ऐसी हो कि ज्यादा से ज्यादा पाठक उससे जुडे़. उन्होंने कहा कि साहित्यकार देश की सांस्कृतिक विरासत एवं विशेषता को आगे ले जाने के वाहक होते है.


राज्यपाल ने कहा कि अब वे भी लेखक हो गये हैं. उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के मराठी दैनिक ‘सकाळ’ की तरफ से उनके जीवन के संस्मरण लिखने का अनुरोध किया गया. उनके साथ-साथ महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों क्रमशः शरद पवार, मनोहर जोशी तथा सुशील कुमार शिंदे के भी संस्मरण प्रकाशित किये जाने का निर्णय लिया गया. समाचार पत्र में प्रकाशित संस्मरणों की लोकप्रियता को देखते हुये लोगों का अनुरोध था कि संस्मरणों को संकलन संग्रह के रूप में प्रकाशित किया जाये. लोगों के अनुरोध पर 25 अप्रैल, 2016 को मेरे संस्मरण संग्रह का लोकार्पण चरैवेति! चरैवेति!! के नाम से हुआ. महाराष्ट्र में निवास करने वाले अन्य भाषियों ने मुझसे कहा कि पुस्तक का प्रकाशन हिंदी सहित अन्य भाषाओं में भी होना चाहिए. इसी क्रम में पिछले माह मेरे संस्मरण संग्रह का हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और गुजराती भाषाओं में संस्मरण संग्रह का प्रकाशन राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली एवं राजभवन लखनऊ में हुआ. उन्होंने श्लोक चरैवेति! चरैवेति!! का अर्थ बताते हुये कहा कि चरैवेति! चरैवेति!! से सदैव आगे बढ़ते रहने का संदेश प्राप्त होता है.


श्री नाईक ने अपने संस्मरण पर चर्चा करते हुये कहा कि अटल जी ने विभिन्न आयामों में साहित्य की सेवा की. अपने संस्मरण में उन्होंने अटल जी के काव्य पाठ के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के उत्साहवर्द्धन की बात करते हुये उन्होंने बताया कि जब वे 22 वर्ष पहले कैंसर रोग से पीड़ित थे तो अटल जी अप्रत्याशित रूप से उन्हें घर पर देखने आये. स्वस्थ होने तक अटल जी ने विशेष तौर से समय निकालकर उनके वार्षिक कार्यवृत्त प्रकाशन समारोह में भाग लेकर उनका और कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्द्धन किया. उन्होंने कहा कि अटल जी को अनेक भूमिकाओं में देखने का अपना आनन्द है.


राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि जीवन की धारणा को साहित्य व्यापक बनाता है. पाठ्यक्रम की पुस्तकें व्यक्ति को सब कुछ बना सकती हैं लेकिन इससे इतर साहित्य व्यक्ति को मनुष्य बनाता है. उन्होंने कहा कि गौरव भाव और मानवता उत्पन्न करने वाला साहित्य संस्कार देता है.

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