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चुनाव से ठीक पहले अखिलेश ने लिया यह रिस्क

 Sabahat Vijeta |  2016-09-05 17:48:02.0

akhilesh


शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. सीएम अखिलेश यादव ने आज अपशकुन को दरकिनार कर गाज़ियाबाद में हज हाउस का उद्घाटन किया और वहां स्मार्ट फोन बाँटने का एलान कर तमाम राजनीतिक दलों की नींदें भी उड़ा दीं. पिछले कई साल से यह चर्चाएँ चलती रही हैं कि मुख्यमंत्री रहते जिसके भी क़दम नोयडा या गाज़ियाबाद की ज़मीन पर पड़े वह सत्ता में वापस लौट नहीं पाया. राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, मायावती, नारायण दत्त तिवारी और वीर बहादुर सिंह के साथ यही बात सही होने का नतीजा यह रहा कि अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गाज़ियाबाद दौरे से भी दूरी बनाकर रखी और अपनी सरकार के एक मंत्री को अपने प्रतिनिधि के तौर पर नोयडा भेज दिया.


गाज़ियाबाद में अख्लाक की हत्या हुई तो राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल जैसे बड़े नेता वहां पहुंचे लेकिन अखिलेश वहां नहीं गए तो यही माना गया कि अखिलेश भी ऐसे टोटकों पर भरोसा करते हैं और इसी वजह से उन्होंने गाज़ियाबाद से दूरी बनाकर रखी है. एमएलसी आशु मालिक को गाज़ियाबाद भेजकर उन्होंने अख़लाक़ के परिवार को लखनऊ बुलवाया और उसे सहायता दी लेकिन खुद वहां नहीं गए. कई ऐसे मौके आये जब अखिलेश को गाज़ियाबाद जाना चाहिए था लेकिन वह वहां नहीं गए.


Lucknow: Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav speaks to media after cabinet meeting at Annexe in Lucknow on Tuesday. PTI Photo (PTI12_1_2015_000121B)

यह माना जाता रहा है कि नोएडा मुख्यमंत्रियों के लिए अपशकुन की ज़मीन है. यहां जिस मुख्यमंत्री के कदम पड़े उसकी कुर्सी चली गर्इ. राजनाथ सिंह, मायावती और कल्याण सिंह इसके जीते-जागते उदाहरण हैं. इन तीनों की सरकार जाते देखकर यूपी के मुख्यमंत्रियों ने वह रास्ता हो छोड़ दिया. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आज जिस हज हाउस का उदघाटन करने गए उसी के शिलान्यास से उन्होंने दूरी बनाकर रखी थी. वह दिल्ली एक्सप्रेस वे के शिलान्यास कार्यक्रम में भी नहीं गए थे.


मायावती ने 2011 में इस अंधविश्वास को ध्वस्त करने का बीड़ा उठाया था लेकिन 2012 के चुनाव में उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार खत्म हो गई और सत्ता की डोर अखिलेश के पास चली गई. अखिलेश ने अपने कार्यकाल का अधिकाँश समय बिता लिया लेकिन उस रास्ते का रुख नहीं किया.


नोएडा की स्थापना 17 अप्रैल 1976 को हुई थी. ज्योतिषीय गणना के मुताबिक उस दिन वृश्चिक राशि उदित हो रही थी. नोएडा की नामाराशी भी वृश्चिक ही है. नोएडा गठन का समय सत्ता सुख का कारक ग्रह सूर्य केतु के साथ ग्रहण योग बनाकर छठे भाव में था. छठा घर पतन का घर होता है. इसी वजह से सियासत नोयडा और गाज़ियाबाद को सत्ता सुख में अपशकुन मानती है. अब जब चुनाव सर पर हैं और अखिलेश को भरोसा है कि उनकी बहाई विकास की गंगा उनके लिए फिर से सत्ता बहाकर लायेगी. ऐसे में अपशकुन मानी जाने वाली जगह में जाकर अखिलेश ने अपशकुन को सीधे तौर पर चैलेन्ज तो किया ही है साथ ही यह प्रयोग भी करने की कोशिश की है कि यह पता चलना ही चाहिए कि सत्ता लगातार किये गए काम से मिलती है या फिर टोटकों से.

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