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जानिये कौन तय करता है 'अखिलेश के एक्शन'

 shabahat |  2017-01-09 14:52:10.0



शबाहत हुसैन विजेता

लखनऊ. पिछले कुछ महीनों से यूपी की सियासत में भूचाल आया हुआ है. हर पार्टी, हर दफ्तर, हर चैनल और हर अखबार में इस भूचाल का ही तज़किरा है. सियासत की दुनिया में शायद यह पहली बार हुआ है कि हर सियासी दल में एक ही शख्स को लेकर सहानुभूति की लहर उठी हुई है. इस शख्स का नाम है अखिलेश यादव.



अखिलेश की सरकार के चार साल दूसरी पार्टियों के निशाने पर थे. कोई विकास को लेकर शोर मचा रहा था तो कोई क़ानून व्यवस्था का मुद्दा बड़े ज़ोर शोर से उठा रहा था. इन चार सालों में यूपी में पांच मुख्यमंत्री का मुद्दा भी छाया हुआ था. इस सरकार का पांचवां साल शुरू हुआ तो एक नारा सुनने को मिला “एक्शन में अखिलेश”.




अखिलेश एक्शन में आये तो विवाद शुरू हो गये. अखिलेश ने सीएम का पूरा चार्ज ले लिया तो हंगामा शुरू हो गया. हंगामा पहले बाहर सुनाई दिया फिर इसकी आवाज़ घर के भीतर से ही सुनाई देने लगी. रोज़ाना तलवार पर धार की जाती और रोज़ तलवार की धार कुंद हो जाती. हर दिन यही सुनाई देता कि सब ठीक है. जबकि ठीक कुछ भी नहीं था. दूसरे दलों में कहा जा रहा था कि सब नेताजी का खेल है. नेताजी ने चर्चा में बने रहने के लिये ऐसा किया है. फिर कहा गया कि नेताजी शिवपाल का क़द कम कर अपने बेटे को स्थापित करने में लगे हैं. बाद में वक्त ने साबित कर दिया कि “बेटा स्थापित नहीं हो रहा था बल्कि विस्थापित हो रहा था”.



विस्थापित हो रहे अखिलेश की वापसी की कोशिशें भी साथ-साथ चली हैं. यह कोशिशें कहाँ से हो रही थीं इस पर न किसी ने बात की न किसी को पता था. यह सोचने की फुर्सत भी किसी के पास नहीं थी कि जिन दिनों यूपी की सियासत में रोज़ाना तोड़फोड़ की बात हो रही थी उस सियासत में “काम बोलता है” जैसा नारा कहाँ से आया.



सियासी जंग के दौर में जब यूपी के सीएम के घर ही में महाभारत छिड़ी हुई है. जब भाई-भाई के बीच दीवार उठ गई है. जब चाचा-भतीजे के बीच जंग छिड़ी हुई है. जब बाप-बेटे के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. जब परिवार के खिलाफ परिवार था. जब असली-नकली की जंग शुरू हो गई थी तब भी कोई था जो अखिलेश की वापसी के रास्ते बना रहा था.



मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज से सांसद डिम्पल यादव पिछले कुछ महीनों से नेपथ्य में हैं. वास्तव में नेपथ्य में रहकर वह टीम अखिलेश में सबसे अहम रोल निभा रही हैं. सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव की छवि गढ़ने के लिये जो तरीके अपनाए जा रहे हैं उनके पीछे डिम्पल यादव का ही रोल है. डिम्पल यादव के पास इस वक्त कई जिम्मेदारियां हैं. अखिलेश की छवि निखारने के लिये जो नारे गढ़े जा रहे हैं, जो पोस्टर बनाये जा रहे हैं, जो वीडियो बनाये जा रहे हैं वह सब डिम्पल की नज़रों से होकर गुज़रते हैं. इसके अलावा डिम्पल यह भी तय करती हैं कि अखिलेश क्या खाएं और क्या पहनें.



डिम्पल यादव की टीम ने अखिलेश यादव को नये जोश के साथ जोड़ने के लिये जो तैयारी की है, उसकी झलकियाँ देखनी हों तो बात समझ में आ जायेगी कि मेहनत हुई है:-

जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है ।।

मैं चलूँ तो मेरे संग कारवाँ चले,
बात गुरूर की नहीं, ऐतबार की है
+++ +++ +++
अखिलेश का झण्डा लेकर हम आसमां तक जायेंगे
करो जश्न की तैयारी, हम फिर सरकार बनाएंगे
हमको चाहिए सिर्फ अखिलेश
+++ +++ +++
फिर सौंप दो !!!
उजाले के हाथ में यूपी !!!
जय अखिलेश फिर अखिलेश !!!
अखिलेश यादव ज़िंदाबाद !!!
+++ +++ +++

नो कन्फ्यूजन नो मिस्टेक जय भैया अखिलेश यादव जय भैया अखिलेश यादव सिर्फ अखिलेश सिर्फ अखिलेश

जय जय जय अखिलेश जय अखिलेश जय अखिलेश

जय-जय-जय जय अखिलेश का नारा पिछले कुछ दिनों से सुनाई भी देने लगा है. बाकी नारों को अभी प्रचलित नहीं किया गया है. समाजवादी परिवार के घमासान पर विराम लगते ही यह नारे फिज़ा में पहुंचेंगे और डिम्पल यादव की मेहनत सड़कों पर नज़र आने लगेगी.

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